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भगवान शंकर की पूजा अर्चना को भक्तों का निकला हूजूम!..महाशिवरात्रि पर शिवालयों में शिवभक्तों का सैलाब

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भगवान शंकर की पूजा अर्चना को भक्तों का निकला हूजूम!..महाशिवरात्रि पर शिवालयों में शिवभक्तों का सैलाब


किरण नाई वरिष्ठ पत्रकार


गाज़ीपुर। खबर गाजीपुर जिले से है जहां पर महाशिवरात्रि के अवसर पर गाजीपुर में आदिदेव भगवान शंकर की पूजा अर्चना को भक्तों का हूजूम जिले के शिव मंदिरों में उमड पडा। सुबह से ही शिव मंदिरों में भक्तों की कतार लगने लगी। बडी संख्या में भोलेनाथ की उपासना करने भक्त श्रीसिद्धेश्वनाथ महादेव मंदिर पहुंचे। मान्यता के अनुसार गाजीपुर का यह शिव मंदिर बेहद प्राचीन है। यहां भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग लोगो की आस्था का केंद्र है। शहर के बड़ा महादेवा पर शिव भक्तों की भारी भीड़ जुटी नजर आई। इसके अलावा शहर के ददरीघाट महादेव मंदिर, कपूरपुर महादेव मंदिर, बूढेनाथ महदेव मंदिर, घायल महादेव मंदिर, अमरनाथ मंदिर समेत तमाम शिवालयों में भक्तों की भारी भीड नजर आयी। लहुरी काशी के नाम से विख्यात गाजीपुर के शिव मंदिरों में भक्तों के उमडे सैलाब को देखते हुए जिला प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतेजाम किए है। मंदिरों में दर्शन के लिए शिवभक्तों की लम्बी लम्बी कतारे लगी रही। जिले के चौमुख धाम और महाहार धाम में भी हजारों की संख्या में शिव भक्तों ने दर्शन पूजन किया। शिवरात्रि तो हर महीने में आती है लेकिन महाशिवरात्रि सालभर में एक बार आती है। फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का त्योहार मनाया जाता है। महाशिवरात्रि का महत्व इसलिए है क्योंकि यह शिव और शक्ति की मिलन की रात है। आध्यात्मिक रूप से इसे प्रकृति और पुरुष के मिलन की रात के रूप में बताया जाता है। शिवभक्त इस दिन व्रत रखकर अपने आराध्य का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाशिवरात्रि के दिन शिवजी पहली बार प्रकट हुए थे। शिव का प्राकट्य ज्योतिर्लिंग यानी अग्नि के शिवलिंग के रूप में था। ऐसा शिवलिंग जिसका ना तो आदि था और न अंत। बताया जाता है कि शिवलिंग का पता लगाने के लिए ब्रह्माजी हंस के रूप में शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग को देखने की कोशिश कर रहे थे लेकिन वह सफल नहीं हो पाए। वह शिवलिंग के सबसे ऊपरी भाग तक पहुंच ही नहीं पाए। दूसरी ओर भगवान विष्णु भी वराह का रूप लेकर शिवलिंग के आधार ढूंढ रहे थे लेकिन उन्हें भी आधार नहीं मिला। मान्यता है कि महाशिवरात्रि को शिव और शक्ति का विवाह हुआ था। इसी दिन शिवजी ने वैराग्य जीवन छोड़कर गृहस्थ जीवन में प्रवेश किया था। माना जाता है कि शिवरात्रि के 15 दिन पश्चात होली का त्योहार मनाने के पीछे एक कारण यह भी है।

 
 
 

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